फिर भी रेट नहीं हो रहे हैं कम ! – नवभारत टाइम्स – 22-Nov-2014

November 24, 2014 - Uncategorized

उम्मीदों के मुताबिक रियल एस्टेट की चाल बन नहीं पा रही है। वजह है बायर्स की उदासी। फिर भी मार्केट में फ्लैट्स के रेट कम नहीं हो रहे हैं। वजह क्या है? इसके लिए डिवेलपर्स के अपने-अपने दावे हैं। वहीं खरीदारों की सोच कुछ और ही है। लोगों को प्रोजेक्ट तक लाने के लिए अफर्डेबल हाउसिंग को भी आजमाया जा रहा है। इन सबके बारे में बता रहे हैं लोकेश के. भारती…

अफर्डेबल घरों की लगातार लॉन्चिंग ने ज्यादातर डिवेलपर्स को अपनी स्ट्रेटजी पर सोचने के लिए मजबूर किया है। दरअसल, डीडीए और जीडीए के सस्ते स्कीम्स के अलावा और हुडा ने प्राइवेट के साथ मिलकर जो प्रोजेक्ट ला रहे हैं, वे लोगों को सस्ते घरों का ऑप्शन दे रहे हैं। ऐसे में यह दबाव दूसरे डिवेलपर्स भी महसूस कर रहे हैं। कुछ तो अपने ही दूसरे प्रोजेक्ट को तेज करने के लिए अफर्डेबल को सपोर्ट कर रहे हैं। हरियाणा में पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पर्टनरशिप) मॉडल के साथ जो प्रोजेक्ट लॉन्च हो रहे हैं, इनकी रेंज 12-13 लाख रुपये के आसपास से शुरू होती है। उनके ऊपर भी रेट कम करने के दबाव हैं, फिर भी वे नहीं कर पा रहे हैं।

अगर डिवेलपर्स की बातों पर यकीन करें तो घरों के निर्माण में लागत काफी आ रही है। जमीन अब सस्ते नहीं हैं। आरजी ग्रुप के एमडी राजेश गोयल कहते हैं कि फुट फ्लोर एरिया का अनुपात में अधिक खर्च और निर्माण में भारी लागत की वजह से हम कीमत कम नहीं कर सकते। इनके अलावा भी कई खर्चे हैं। साथ ही हम क्वॉलिटी से भी समझौता नहीं करना चाहते। वहीं ऐस ग्रुप के सीएमडी अजय कुमार का दावा है कि डिवेपलर्स अभी बहुत ही कम मार्जिन पर काम कर रहे हैं। हमारे लिए कीमत कम करना बहुत मुश्किल है।

लैंड कॉस्ट अधिक

घर बनाने के लिए सबसे जरूरी है जमीन। अगर जमीन ही महंगी होगी तो उसका कंस्ट्रक्शन कॉस्ट बढ़ ही जाएगा। वैसे भी दिल्ली में तो जमीन की किल्लत है ही, अब एनसीआर भी इसी ट्रैक पर आगे बढ़ रहा है। अगर कम कीमत पर घर चाहिए तो अफर्डेबल घर और बनाने चाहिए। एसवीपी ग्रुप के सीएमडी विजय जिंदल कहते हैं कि कम कीमत की घरों के लिए यह जरूरी है कि सस्ती जमीन मिले। सरकार को ऐसे प्रयास करने चाहिए ताकि अधिक से अधिक सस्ते घर बने। मॉडेस्ट स्ट्रक्चर्स के डायरेक्टर आदर्श राणा की मानें तो लागत में कमी और जमीन की कीमत अगर कम होगी तो शायद कॉस्ट भी कम हो। वहीं एयरविल ग्रुप के डायरेक्टर विकास भगत का कहना है कि मार्जिन कम होने की वजह से कीमत में कमी मुश्किल है।

क्लियरेंस में प्रॉब्लम

अमूमन सभी डिवेलपर्स इस बात से इत्तिफाक रखते हैं कि प्रोजेक्ट को क्लियर होने में इतना वक्त लग जाता है कि घर की कीमत स्वाभाविक ही बढ जाती है। वहीं मार्केट के जानकार भी इस बात को मानते हैं कि कॉस्टिंग को कम करने के लिए क्लियरेंस वाली समस्या को सुलझा लिया जाए। इससे प्रोजेक्ट में देरी नहीं होगी। डिवेलपर्स इस बात को इस तरह समझाते हैं कि जब घर की बुकिंग होती है तो सीमेंट, ईंट, बालू, छड़ और मजदूर पर लागत कम होती है, पर यह वक्त के साथ ही बढता जाता है। उसमें जब प्रोजेक्ट डिले हो जाए तो फिर कॉस्ट को कम करना बहुत मुश्किल हो जाता है।

लोगों की सोच

अमर वर्मा जो दिल्ली के एक आईटी फर्म में काम करते हैं। इन्हें भी 2 बीएचके घर की जरूरत है। पर कीमत इनके रेंज से कुछ बाहर है। ये इंतजार करना चाहते हैं। इनका मानना है कि पिछले से इस साल तक रियल एस्टेट की स्थिति में बदलाव हुआ है। 2013 में कुछ डिवेलपर्स ही बुकिंग के वक्त 10 फीसदी रकम और बाकी पजेशन के वक्त देने का ऑफर देते थे, पर अब तो यह ऑफर अमूमन हर डिवेलपर दे रहा है।

यानी चीजें बदल रही हैं। हो सकता है कीमत भी कम हो। अधिक ना सही कुछ तो कम हो।

 

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